स्वतंत्रता दिवस एक ऐसा मौक़ा होता है जब हम हमारे देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने और क़ुर्बान होने वाले स्वतंत्रता सैनानियों को याद करते हैं।लेकिन दुर्भाग्य से कुछ ऐसे भी नाम हैं जिनका योगदान किसी से कम नहीं लेकिन फिर भी वे हमारे लिए बेनाम-बेचेहरा बने हुए हैं। वनवासियों को आज़ादी प्यारी होती है और उन्हें किसी बंधन में जक़डा नहीं जा सकता है। इन्ही वनवासियों ने सबसे पहले जंगलों से ही विदेशी आक्रांताओं एवं दमनकारियों के विरुद्ध संघर्ष किया| ऐसे ही महान क्रांतिकारी हुए हैं अल्लूरी सीताराम राजू। जिनका जन्म 4 जुलाई 1897 को विशाखापट्टणम जिले के पांड्रिक गांव में हुआ।क्रांतिकारी, वीर राजू ने स्कूली शिक्षा के साथसाथ निजी रुचि के तौर पर वैद्यक और ज्योतिष का भी अध्ययन किया और यह अध्ययन उनके व्यवहारिक अभ्यास में भी लगा रहा। इसके कारण ही जब उसने युवावस्था में आदिवासी समाज को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित करना शुरू किया तो इन विषयों की जानकारियों ने उसे अभूतपूर्व सहायता प्रदान की। राजू का पालनपोषण उसके चाचा अल्लूरी रामकृष्ण के परिवार में हुआ। इनके पिता अल्लूरी वेंकट रामराजू गोदावरी के माग्गूल ग्राम में रहते थे, उन्हें औपचारिक शिक्षा बहुत कम मिल पाई थी। अपने एक संबंधी के संपर्क से वे अध्यात्म की ओर आकृष्ट हुए तथा 18 वर्ष की उम्र में ही साधु बन गए। सन 1920 में अल्लूरी सीताराम पर महात्मा गांधी के विचारों का बहुत प्रभाव पड़ा और उन्होंने आदिवासियों को मद्यपान छोड़ने तथा अपने विवाद पंचायतों में हल करने की सलाह दी। किंतु जब एक वर्ष में स्वराज्य प्राप्ति का गांधी जी का सपना साकार होता हुआ नहीं दिखा तो सीताराम राजू ने अपने अनुयायी आदिवासियों की सहायता से अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करके स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने के प्रयास आंरभ कर दिए।
इस सशस्त्र विद्रोह में उनका साथ अनेक वीर साहसी वीरो ने दिया| जिनमे एक नाम उनके साथी बीरैयादौरा का भी आता है जिनका अपना अलग वनवासी संगठन था। इस संगठन ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ युद्ध छ़ेड रखा था। अंग्रेज बीरैयादौरा को फांसी पर लटका देते लेकिन तब तक सीताराम राजू का संगठन बहुत बलशाली हो चुका था। पुलिस राजू से थरथर कांपती थी। वह ब्रिटिश सत्ता को खुलेआम चुनौती देता था।आंध्र के रम्पा क्षेत्र के सभी वनवासी राजू को भरसक आश्रय, आत्मसमर्थक देते रहते थे। स्वतंत्रता संग्राम की उस बेला में उन भोलेभाले बेघर, नंगे बदन और सर्वहारा समुदाय ने अंग्रेजों के क़ोडे खाकर भी राजू के ख़िलाफ़ मुख़बरी नहीं की।अंग्रेजों ने बीरैयादौरा को एक मुठभ़ेड में गिरफ्तार कर लिया, उसे जेल में रखा, लेकिन वह जेल की दीवार कूदकर जंगलों में भाग गया। उसके बाद बीरैयादौरा ने दल से संपर्क ज़ोडकर ब्रिटिश सत्ता से संग्राम जारी रखा। जिसमें वो दोबारा जेल भेज दिए गए। लेकिन इस बार उन्हें अल्लुरी सीताराम राजू ने बचा लिया और संगठन को मजबूती दी| मालाबार का पर्वतीय क्षेत्र छापामार युद्ध के लिए अनुकूल था। इसके अलावा क्षेत्रीय लोगों का पूरा सहयोग भी उन्हें मिल रहा था। आन्दोलन के लिए प्राण तक न्यौछावर करने वाले लोग उनके साथ थे। इसीलिए आन्दोलन को गति देने के लिए गुदेम में गाम मल्लू डोरे और गाम गौतम डोरे बंधुओ को लेफ्टिनेट बनाया गया।उनकी क्षमता का पता इस बात से लग जाता है की जब पृथ्वीसिंह आज़ाद राजमहेन्द्री जेल में क़ैद थे, तब सीताराम राजू ने उन्हें आज़ाद कराने का प्रण किया। उनकी ताकत व संकल्प से अंग्रेज़ सरकार परिचित थी। इसलिए उसने आस-पास के जेलों से पुलिस बल मंगवाकर राजमहेंद्री जेल की सुरक्षा के लिए तैनात किया।राजू द्वारा चकमा देकर पहा़डयों में विलुप्त हो जाने की वजह से अंग्रेज उन्हें रम्पा फितूरी कहते थे। ब्रिटिश अफसर राजू से लगातार मात खाते रहे। आंध्र की पुलिस राजू के सामने व्यर्थ साबित हो चुकी थी। अंत में केरल की मलाबार पुलिस के दस्ते राजू पर लगाए गए, क्योंकि उन्हें पर्वतीय इलाकों में छापे मारने का अनुभव था।उसके बाद भी पुलिस राजू को गिरफ्तार नहीं कर सकी।अल्लूरी राजू विद्रोही संगठन के नेता थे और 'असम रायफल्स' का नेतृत्त्व उपेन्द्र पटनायक कर रहे थे। दोनों ओर की सेना के काफी सैनिक मारे जा चुके थे। अगले दिन 7 मई 1924 को पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार सीताराम राजू को पकड लिया गया। उस समय सीताराम राजू के सैनिकों की संख्या कम थी फिर भी 'गोरती' नामक एक सैन्य अधिकारी ने सीताराम राजू को पेड़ से बांधकर उन पर गोलियाँ बरसाईं। अल्लूरी सीताराम राजू के बलिदान के बाद भी अंग्रेज़ सरकार को विद्रोही अभियानों से मुक्ति नहीं मिली। इस प्रकार लगभग दो वर्षों तक ब्रिटिश सत्ता की नींद हराम करने वाला यह वीर सिपाही शहीद हो गया।
किन्तु ऐसे वीरो को हमारे इतिहास में कही भी स्थान नहीं दिया गया और सीताराम राजू जैसे वीर आज की युवा पीढ़ी के लिए वीरता का आदर्श है जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश की आज़ादी के लिए संघर्ष में बिता दिया| उम्मीद करते हैं हम इन्हे फिर से वही स्थान दिला सके जिसके वे हक़दार हैं|


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