बीना दास - 1911-1986
- हमारे इतिहास की कमी यह है कि ब्रिटिश सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने की नींव जिन लोगों ने रखी, उनमें से सिर्फ कुछ लोगों को ही सही पहचान मिल पाई। अन्य क्रांतिकारी और विशेषकर महिला क्रांतिकारियों के नाम आज भी इतिहास के पन्नों से नदारद हैं। इसका कारण लोगो में जागरूकता की कमी हैं जो उन्हें सही पहचान दिलाने में कामयाब न हो सकें। इसलिए हमे अब जागरूक होने की आवश्कता हैं , ताकि इन्हे भी वही सम्मान मिले जिसके ये हक़दार हैं।
- बीना दास का जन्म 24 अगस्त 1911, में बंगाल प्रांत के कृष्णानगर के ब्रितानी गांव में हुआ था। 21 साल की बीना दास ने जब बंगाल के गवर्नर स्टेनले जैक्सन पर भरी सभा में गोलियां चलाई तो
इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इस लड़की के साहस ने न सिर्फ अंग्रेजों के
दिलों में डर भरा बल्कि स्त्रियों के प्रति भारतीयों की रुढ़िवादी सोच को भी चुनौती
दी। यह वह दौर था जब अंग्रेजी अफसर बंगाल में अपनी पोस्टिंग होने से डरने लगे थे।
कई अफसरों ने अपना तबादला कराने के लिए सिफारिशें कीं, क्योंकि उन्हें
डर था कि यहाँ कोई भी विद्यार्थी उन्हें कभी भी गोलियों से भून सकता है।
- उन दिनों क्रान्तिकारियों का एक काम बड़े
अंग्रेज़ अधिकारियों को गोली का निशाना बनाकर यह दिखाना था कि भारत के निवासी उनसे
कितनी नफरत करते हैं। 6 फ़रवरी, 1932 ई. को बंगाल के
गवर्नर स्टेनली जैक्सन को विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को दीक्षांत समारोह में
उपाधियाँ बाँटनी थीं। बीना दास को बी.ए. की परीक्षा पूरी करके दीक्षांत समारोह में
अपनी डिग्री लेनी थी। उन्होंने अपने साथियों से परामर्श करके तय किया कि डिग्री
लेते समय वे दीक्षांत भाषण देने वाले बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन को अपनी गोली
का निशाना बनाएंगी।
- 6 जनवरी, 1932 को दीक्षांत
समारोह में जैसे ही गवर्नर ने भाषण देने शुरू किया, बीना दास अपनी
सीट पर से उठीं और तेज़ी से गवर्नर के सामने जाकर रिवाल्वर से गोली चला दी। लेकिन दुर्भाग्य से निशाना चूक गया और वह बच
गया। बीना दास को वहीं पर पकड़ लिया गया। उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसकी
सारी कार्यवाई एक ही दिन में पूरी करके बीना को नौ वर्ष की कड़ी क़ैद की सज़ा दे
दी गई। अपने अन्य साथियों के नाम बताने के लिए पुलिस ने उन्हें बहुत सताया,
लेकिन
बीना ने मुंह नहीं खोला।
- 1937 में प्रान्तों में कांग्रेस सरकार बनने के बाद
अन्य बंदियों के साथ बीना भी जेल से बाहर आईं। इसके बाद भी उनके मन में आजादी की
ज्वाला ज्वलंत रही और उन्होंने गाँधी जी के साथ आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू किया। इसके फलस्वरूप उन्हें 'भारत छोड़ो
आन्दोलन' के समय उन्हें तीन वर्ष के लिये नज़रबन्द कर लिया गया था।
- 1946 से
1951 तक वे बंगाल विधान सभा की सदस्य रहीं। गांधी जी की नौआख़ाली यात्रा
के समय लोगों के पुनर्वास के काम में बीना ने भी आगे बढ़कर हिस्सा लिया था। लेकिन
उन्होंने इतिहास में हमारा समाज वह सम्मान देने में समर्थ न हुआ इसका कारण क्या रहा
यह प्रश्न महत्पूर्ण हैं, और इसका उत्तर हमारे आज के समाज के प्रति जो कर्तव्य और
जिम्मेदारी हैं, उनसे
मुँह मोड़ना और अपनी विरासत को भूल जाना हैं।
- देश को आज़ादी दिलाने वाली और अन्य नारियों को प्रेरित करने वाली वीरांगना और वीर क्रांतिकारियों में गिनी जाने वाली बीना दास का 26 दिसम्बर, 1986 ई. में ऋषिकेश में देहावसान हुआ।


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